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तीन मुगल बादशाहों (जहाॅंगीर, शाहजहाॅं व औरंगजेब) को अपने कार्यों से प्रभावित किया।

बिहारी मिर्जा राज जयसिंह का दरबारी कवि, इसने 1663 ई. में ‘बिहारी सतसई‘ की रचना की। जयसिंह ने बिहारी को 1-1 दोहे पर 1-1 स्वर्ण मुद्रा दी व गाॅंव भी ईनाम में दिये। इन्होनें जयसिंह को अय्यासी के चंगुल से छुड़ाया।

शाहजहाॅं ने अप्रेल 1639 ई. में इसको रावल पिण्डी बुलाकर ‘मिर्जा राजा‘ की पदवी दी। यह पदवी इनके दादा मानसिंह को भी अकबर ने दी थी।

शाहजहाॅं के मध्य एशियाई अभियान (1647 ई.) में जयसिंह ने अपने अपूर्व साहस का परिचय दिया।

जयसिंह प्रथम ने शिवाजी को बन्दी बनाने के लिये 23 जून 1665 ई. को पुरन्दर की सन्धि की। मिर्जा राजा जयसिंह के साथ 1665 ई. में पुरन्दर के घेरे के समय बर्नियर उपस्थित था।

जयसिंह द्वारा आमेर के महल, जयगढ और औरंगाबाद में जयसिंहपुरा नगर बसाया।

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