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राजस्थान के जिलों की आकृतियों की समानता (Rajasthan Me Jilo Ki Aakriti) || राजस्थान के जिलों की आकृति (Rajasthan Ke Jilo Ki Aakriti) || Rajasthan Ke Jhilo Ki Aakriti



राजस्थान के जिलों की आकृति


  • अजमेर : त्रिभुजाकार
  • भीलवाड़ा :आयताकार
  • चित्तौड़गढ़ : घोड़े की नाल की समान
  • उदयपुर : ऑस्ट्रेलिया के समान
  • जालौर : व्हेल मछली के समान
  • राजसमंद : तिलक के समान
  • जैसलमेर : सप्तबहुभुजाकार
  • जोधपुर : मयूर आकार
  • सीकर : प्यालानुमा अर्धचंद्राकार
  • टोंक : पतंग आकार


राजस्थान में सूती वस्त्र उद्योग (Cotton Textile Industry In Rajasthan) | Rajasthan Me Suti Vastra Udhog || SSC || IBPS || RPSC



राजस्थान में सूती वस्त्र उद्योग
(Cotton Textile Industry In Rajasthan)


राजस्थान में कृषि पर आधारित उद्योगों में सूती वस्त्र उद्योग प्रमुख है। राजस्थान निर्माण के समय यहाँ सूती कपड़े की कुल 7 मिलें थीं। जो मार्च 1990 में 34 तक हो गई किन्तु 2001 में घटकर इनकी संख्या 22 ही रह गई। सूती वस्त्र से ही जुड़ी धागा बनाने वाली मिल , जिनकी संख्या 50 है। वास्तव में वर्ष 2009-10 में राज्य में सूती वस्त्र निर्माण विषयक 68 कारखाने हैं।

राज्य में प्रथम सूती कपड़ा मिल 1889 में ‘दी कृष्णा मिल्स लिमिटेड' के नाम से ब्यावर में स्थापित की गई। वर्ष 1906 में ब्यावर में ही दूसरी और 1955 में यहाँ तीसरी मिल स्थापित की गई। इस प्रकार ब्यावर सूती वस्त्र उद्योग का केन्द्र बन गया। वर्ष 1988 में भीलवाड़ा में, 1942 में पाली में तथा 1946 में श्रीगंगानगर में सूती वस्त्र मिलें स्थापित की गईं। स्वतन्त्रता के पश्चात्सूती वस्त्र उद्योग का पर्याप्त विस्तार हुआ। कोटा, भीलवाड़ा, किशनगढ़, जयपुर, उदयपुर, गंगापुर, बांसवाड़ा, आबूरोड, अलवर, गुलाबपुरा, भवानीमण्डी, जोधपुर आदि नगरों में सूती वस्त्र मिलें स्थापित की गईं। आज यावर, किशनगढ़, भीलवाड़ा, पाली, उदयपुर, श्रीगंगानगर, कोटा, सूती वस्त्र उद्योग के प्रमुख केन्द्र हैं। फरवरी 2009 में केन्द्र सरकार ने भीलवाड़ा को वस्त्र निर्यातक नगर का दर्जा दिया है।

राज्य में स्थापित अधिकांश मिलों की मशीनें पुरानी हो जाने से उत्पादन प्रभावित हो रहा है। यद्यपि आधुनिकीकरण के उपाय किए जा रहे हैं, किन्तु वे सीमित हैं। राज्य में सूती धागे एवं सूती वस्त्र का उत्पादन वर्ष 2009-10 में क्रमशः 1058 लाख किग्रा एवं 498 लाख मी का उत्पादन किया गया। राज्य में निजी क्षेत्र की 17 सूती वस्त्र मिलें कार्यरत हैं।

राजस्थान में सीमेंट उद्योग (Cement Industry in Rajasthan) || Rajasthan Me Cement Udhog || SSC || IBPS || RPSC



राजस्थान में सीमेंट उद्योग
(Cement Industry in Rajasthan)


राजस्थान में सीमेन्ट उद्योग का समुचित विकास हुआ है और भावी विकास की सम्भावना भी है, क्योंकि उसके लिए आवश्यक कच्चा माल चूने का पत्थर (लाइम स्टोन) यहाँ प्रचुरता में उपलब्ध है। एक टन सीमेन्ट तैयार करने में लगभग 1.6 टन चूने के पत्थर की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त जिप्सम भी यहाँ उपलब्ध है। कोयला अवश्य बाहर से आयात करना होता है। राज्य में प्रथम सीमेन्ट का कारखाना 1915 में लाखेरी (बूंदी) में स्थापित किया गया। वर्तमान में राज्य में सीमेन्ट की 12 बड़ी इकाइयाँ और अनेक लघु प्लाण्ट सक्रिय हैं। आँकड़ों के आधार पर राज्य में 115 लघु सीमेन्ट प्लाण्ट स्थापित किए गए जिनकी संयुक्त क्षमता 6 लाख टन है, किन्तु इनमें से अनेक अब बन्द हो चुके हैं। राज्य के सीमेन्ट कारखानों में सर्वाधिक क्षमता जे.के. सीमेन्ट (निम्बाहेड़ा) की तथा न्यूनतम श्री राम सीमेन्ट (कोटा) की है।

राज्य में सीमेन्ट निर्माण के प्रमुख कारखाने
  • ए.सी.सी.लि. लाखेरी (बूंदी) 1971 में स्थापित
  • जयपुर उद्योग, सवाई माधोपुर (बन्द पड़ा है।
  • बिड़ला सीमेन्ट वक्र्स लि. चित्तौड़गढ़।
  • चितौड़गढ़ सीमेन्ट वक्र्स लि. चित्तौड़गढ़ (चेतक छाप)
  • मंगलम सीमेन्ट, मोडक (कोटा) बिड़ला
  • श्री सीमेन्ट ब्यावर (श्रीछाप)
  • जे.के, सीमेन्ट लि (जे.के. छाप) (निम्बाहेड़ा)
  • स्ट्रा प्रोडक्ट्स बनास सिरोही)
  • श्रीराम सीमेन्ट, श्री रामनगर (कोटा)
  • बिड़ला व्हाइट सीमेन्ट, गोटन
  • हिन्दुस्तान सीमेन्ट, उदयपुर
  • राजश्री सीमेन्ट, खारिया, मीरापुर (नागौर)

राज्य में सीमेन्ट उत्पादन की स्थिति


सन् 1951 में राज्य में सीमेन्ट उत्पादन के दो कारखाने लाखेरी (बूंदी) व सवाई माधोपुर में थे जिनमें प्रतिवर्ष 25 लाख टन सीमेन्ट उत्पादन होता था। इनके बाद राज्य में अनेक सीमेन्ट उत्पादन कारखाने स्थापित हुए जिससे सन् 2000 में सीमेन्ट उत्पादन बढ़कर 92 लाख टन हो गया। राजस्थान खनिज विभाग तीन और जिलों में सीमेन्ट उत्पादन के 10 लाइम स्टोन ब्लॉक्स लगाने की तैयारी कर रहा है। इससे प्रदेश के सीमेन्ट उत्पादन में करीब 25 मिलियन टन की बढ़ोतरी हो जाएगी। अभी प्रदेश में सीमेन्ट उत्पादन के 15 प्लाण्ट लगे हुए हैं, जिनसे 43 मिलियन टन सीमेन्ट का उत्पादन हो रहा है। विभाग जैसलमेर में 6, चित्तौड़गढ़ और नागौर में 2-2 ब्लॉक्स खोलने की तैयारी कर रहा है।



राजस्थान में ऊनी वस्त्र उद्योग (Woolen Textile Industry in Rajasthan) || Rajasthan Me Uni Vastra Udhog || SSC || IBPS || RPSC Notes


राजस्थान में ऊनी वस्त्र उद्योग
 (Woolen Textile Industry in Rajasthan)



राजस्थान में ऊन का व्यवसाय बहुत पुराना एवं महत्वपूर्ण है। यहाँ पश्चिमी राजस्थान में भेड़ पाली जाती हैं। भारत की 25% भेड़ (.90 लाख ) राजस्थान में ही पाली जाती हैं जिनसे लगभग 126.77 लाख किग्रा ऊन प्राप्त होती है। ऊन से कम्बल, नमदे, आसन, स्वेटर, जरसी, घुग्घी, घोड़ों तथा ऊँटों की जीन, मोटा ऊनी कपड़ा, शाल, दुसाला आदि बनाए जाते हैं।

ऊन उद्योग की प्रमुख इकाइयाँ निम्न हैं

(1) स्टेट वूलन मिल्स, बीकानेर
(ii) वर्टेड स्पिनिंग मिल्स, चूरू
(iii) विदेशी आयातनिर्यात संस्थान, कोटा
(iv) वर्टेड स्पिनिंग मिल्स, लाडनू

मालपुरा एवं टोंक में भी नमदे, आसन, घुग्घियाँ, चकमें आदि बनाए जाते हैं। यहाँ के नमदे देशविदेश में प्रसिद्ध हैं। भीलवाड़ा में एक प्रोसेसिंग हाउस का निर्माण हुआ है जिसकी प्रोसेसिंग क्षमता 6 लाख कम्बल प्रतिवर्ष है।

राजस्थान में ब्रिटिश शासन का विस्तार (Rajasthan Me British Sasan Ka Vistar) || Expansion of British rule in Rajasthan || GK For Competition Exams || Rajasthan GK Important Questions




राजस्थान में ब्रिटिश शासन का विस्तार


भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन का प्रभाव राजस्थान की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक स्थिति पर भी पड़ा। वर्ष 1749 से पूर्व राजस्थान में कुल 19 रियासतें थी तथा कुशलगढ़, नीमराणा और कावा की चीफशिप की प्रशासनिक इकाइयाँ भी थीं। इनमें से उदयपुर, गूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और शाहपुरा में गुहिल राजपूत जोधपुर, बीकानेर और किशनगढ़ में राठौड़ राजपूत कोटा और उदी में देवड़ा चौहान, जयपुर और अलवर में कछवाहा राजपूत जैसलमेर और करौली में यदुवंशी राजपूत झालावाड़ में झाला राजपूत भरतपुर और धौलपुर में जाट राजाओं के राज्य थे। टोंक में मुसलमान नवाब का राज्य था। इन सबके मध्य में अजमेर मारवाड़ प्रदेश था। यह सम्पूर्ण क्षेत्र भक्तिशौर्य और बलिदान की गाथाओं के कारण विख्यात था। मेवाड़ के राणा कुम्भासाँगा और महाराणा प्रताप मारवाड़ के राजा मालदेव, भरतपुर का जाट राजा सूरजमलदी के हाड़ा राजा हम्मीर आदि ने समयसमय पर अपने स्वाभिमान और शौर्य का प्रदर्शन किया और स्वतन्त्रता की रक्षा की थी।

बाद में राजपूताना की रियासतों के राजा अपनी अदूरदर्शिता पूर्ण नीतियों और संगठन शक्ति के अभाव के कारण पहले मुगल बादशाहों और बाद में अंग्रेजों के अधीन हो गए। देशी राज्यों को अंग्रेजों की राजनीतिक परिधि में लाने के लिए गवर्नर जनरल लॉर्ड वैलेजली (1798-1805) द्वारा सहायक सन्धि की नीति प्रारम्भ की गई। जिसके तहत देशी राज्यों की आन्तरिक सुरक्षा व विदेशी नीति का उत्तरदायित्व अंग्रेजों पर था एवं जिसका खर्च सम्बन्धित राज्य को उठाना पड़ता था। कम्पनी इस हेतु उस राज्य में एक

अंग्रेज रेजीडेन्ट की नियुक्ति करती थी व सुरक्षा हेतु अपनी सेना रखती थी। राजस्थान में सर्वप्रथम भरतपुर राज्य के महाराणा रणजीत सिंह ने 29 सितम्बर1808 को लॉर्ड वैलेजली से सहायक सन्धि की परन्तु विस्तृत रक्षात्मक एवं आक्रमण सन्धि सर्वप्रथम अलवर रियासत ने 14 नवम्बर1808 को की थी। भारत में प्रथम सहायक सन्धि 1798 ई. में हैदराबाद के निजाम के साथ की गई थी। बाद में मराठोंपिण्डारियों की लूट-खसोट से तंग आकर राजस्थान के राजाओं ने लॉर्ड हार्डिंग्स की 'आश्रित पार्थक्य की नीति के तहत भी अंग्रेजों से सन्धियाँ की। सर्वप्रथम करौली के राजा ने नवम्बर, 1817 में अंग्रेजों के साथ यह सन्धि की । परन्तु विस्तृत एवं व्यापक प्रभावशाली सन्धि 26 दिसम्बर1817 को कोटा के प्रशासक झाला जालिम सिंह ने कोटा राज्य की ओर से की।

वर्ष 1818 के अन्त तक सभी रियासतों ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ आश्रित पार्थस्य की सन्थियों पर हस्ताक्षर कर दिए और अंग्रेजों को खिराज देना स्वीकार किया। केवल सिरोही राज्य ने कम्पनी से सन्धि 1823 ई. में की। इसकी एवज में कम्पनी ने रियासतों की रक्षा की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली व रेजीडेन्ट व पॉलिटिकल एजेण्ट नियुक्त किए। उस समय भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स थे। धीरे-धीरे अंग्रेजों ने रियासतों के अन्दरूनी मामलों में हस्तक्षेप शुरू कर दिया व अपने हितों के लिए इन राज्यों का आर्थिक शोषण भी शुरू कर दिया। इस प्रकार ब्रिटिश शासन ने राजस्थान की रियासतों पर भी अपना दमन चक्र चलाकर जनता का अधिकाधिक शोषण करना शुरू कर दिया। चार्ल्स मेटकॉफ व कर्नल टॉड ने 181718 ई. की सन्धियों को सम्पादित किया था।

लॉर्ड डलहौजी ने 1848 . में अंग्रेजी राज्य के विस्तार व स्थायित्व की दृष्टि से एक नये सिद्धान्त राज्यों के विलय की नीति का सूत्रपात कियाजिसमें यह व्यवस्था थी कि यदि कोई राजा या नवाब बिना सन्तान मृत्यु को प्राप्त हो जाए, तो रियासत पर उसका परम्परागत अधिकार समाप्त माना जाएगा और जब्त कर उसे अंग्रेजों के अधिकार में ले लिया जाएगा। इस सिद्धान्त की शिकार झांसी, नागपुरअवधकर्नाटक, सतारा आदि रियासतें हुई। इसके तहत सर्वप्रथम 1848 ईमें सतारा को और अन्त में 1856 ई. में अवध को अंग्रेजी राज्य में मिलाया गया। इससे अंग्रेजों के प्रति असन्तोष बढ़ने लगा। इसके अलावा सेना में एनफील्ड राइफलों में चबी लगे कारतूसों के प्रयोग ने सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को बुरी तरह

आहत किया। इससे 29 मार्च1857 को 34वीं रेजीमेन्ट के मंगल पाण्डे ने बैरकपुर छावनी में अंग्रेज सैनिकों को गोली मार दी। 1767 ई. के प्लासी के युद्ध से लेकर 1857 तक के 100 वर्ष के समय में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की शोषणकारीजातीय भेदभाव पूर्ण एवं राजनीतिक दखलन्दाजी पूर्ण नीतियों ने भारतीय जनमानसशासकों व जमींदारों को असन्तुष्ट कर दिया। फलतः देशी राजा व सेना अंग्रेजों के विरुद्ध हो गई और अंग्रेजी सत्ता को भारत से उखाड़ फेंकने की दिशा में पहला प्रयत्न स्वतन्त्रता के प्रथम संग्राम के रूप में सामने आया। देशी राजाओं ने अन्तिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर के नेतृत्व में यह जंग लड़ने का फैसला किया। 10 मई1857 को मेरठ की छावनी में सेना ने विद्रोह कर दिया। अंग्रेजों से देश को स्वतन्त्र कराने की दिशा में यह पहला बड़ा प्रयत्न था। इसी कारण इस क्रान्ति को 'भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्रामकहा जाता है। इस विद्रोह से राजस्थान भी अलग नहीं रह सका। 1857 ई के स्वतन्त्रता संग्राम के समय भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग व राजस्थान के ए. जी. जी. जॉर्ज पेट्रिक्स लॉरेन्स थे और राजस्थान में अंग्रेजी सरकार की व्यावरनसीराबाद, नीमचएरिनपुरादेवली व खैरवाड़ा (उदयपुर) में 6 सैनिक छावनियाँ थीं जिनमें सभी सैनिक भारतीय थे। इस समय मेवाड़ में मेजर शावर्समारवाड़ में मेजर मैकमैसनकोटा में मेजर बर्टन तथा जयपुर में कर्नल ईडन प्रमुख सरकारी एजेण्ट थे।

सवाई जयसिंह/जयसिंह (Savai Jaisingh/ Jaisingh) | Jaysingh/ Savai Jaysingh | All Rajasthan Gk In hindi | Gk Tricks In Hindi


सवाई जयसिंह/जयसिंह ॥ (17001743 ई.)

• सवाई जयसिंह का जन्म 3 दिसम्बर, 1688 को हुआ था।
• जयसिंह सात मुगल बादशाहों के समकालीन थे।
• सवाई जयसिंह 12 वर्ष की अवस्था में आमेर के शासक बने।


  • औरंगजेब ने इसकी वीरता व वाक्चातुर्यता को मिर्जा राजा जयसिंह से बढ़कर (सवाया) आँककर इसका नाम 'सवाई जयसिंह रख दिया।
  • जाजऊ का युद्ध 8 जून, 1707 को औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् उसके दो बेटों मुअज्जम व आजम के बीच राजगद्दी के लिए 8 जून1707 को हुए उत्तराधिकार युद्ध में जयसिंह ने आजम का साथ दियायुद्ध में मुअज्जम विजयी हुआ व बहादुरशाह प्रथम के नाम से दिल्ली का शासक बना।
  • मुअज्जम ने आमेर का नाम बदलकर मोमीनाबादइस्लामाबाद रख दिया।
  • मोहम्मदशाह (रंगीला) मुगल सम्राट, जयसिंह को ‘सरमहाराजहाय,राज राजेश्वर श्री राजाधिराज सवाई की पदवी दी।
  • चूड़ामन भरतपुर का जाट शासक, जयसिंह ने इन्हें परास्त किया।
  • बदनसिंह भरतपुर का जाट, शासकजयसिंह ने इन्हें बृजराज की उपाधि दी।
  • हुरड़ा सम्मेलन 17 जुलाई, 1734 में हुरड़ा (भीलवाड़ा) में मराों के
  • आक्रमण को रोकने के लिए राजस्थान के राजपूत शासकों का सम्मेलन
  • बुलवाया। इस सम्मेलन के अध्यक्ष महाराणा जगतसिंह थे।
  • जगतसिंह द्वितीय की पुत्री कृष्णा कुमारी के विवाह को लेकर जयपुर व जोधपुर में संघर्ष हुआ।
  • जगतसिंह ने अपनी पुत्री का रिश्ता जोधपुर नर भीमसिंह से तय किया था परन्त विवाह से पूर्व इनकी
  • मृत्यु हो जाने के कारण उन्होंने कृष्णा कुमारी का रिश्ता जयपुर नरेश जगतसिंह से तय कर दिया।
  • गिंगोली युद्ध का जयपुर के शासक जगतसिंह ने अमीर खाँ पिण्डारी की सहायता से गिंगोली नामक स्थान पर जोधपुर के शासक भीमसिंह को पराजित किया।
  • शाला (जन्तरमन्तर) जयसिंह ने अपने राज्यकाल में देश में पाँच वैधशालाएँ दिल्लीमथुरा बनारस, उज्जैन तथा जयपुर में बनाई थी। जयपुर स्थित वैधशाला सबसे बड़ी व अपने में सम्पूर्ण है। इसमें 12 यन्त्र हैं जिनकी सहायता से प्रतिदिन ज्योतिर्मण्डल की गतिविधि देखी जा सकती है।
  • राम यन्त्र सवाई जयसिंह द्वारा 1734 ई. में निर्मित पाँच वैधशालाओं में सबसे बड़ी वैधशाला जन्तर-मन्तर में स्थित थी जिसमें ऊँचाई मापने हेतु इस यन्त्र का प्रयोग किया जाता था।
  • सम्राट यन्त्र जयसिंह द्वितीय ने सूर्य की गणनाओं के लिए सम्राट यन्त्र का निर्माण करवाया जो विश्व की सबसे बड़ी सूर्य घड़ी है। सम्राट यन्त्र से एक सेकण्ड के दसवें हिस्से तक का ठीक-ठीक समय जाना जा सकता है।
  • जयसिंह ने नक्षत्रों की शुद्ध सारणी जीज मोहम्मद शाही) बनवाई।
  • जयसिंह द्वितीय ने 18 नवम्बर1927 को जयपुर नगर की नींव डाली। उनके प्रसिद्ध पण्डित का नाम
  • पण्डित जगद्धनाथ था एवं प्रसिद्ध शिल्पकार विद्याधर भट्टाचार्य बंगाली इंजीनियर) थे, इन्होंने जयपुर नगर को सुनियमित और सुनियोजित ढंग से बसाने में महती भूमिका निभाई। जयपुर शहर के डिजाइन हेतु इटली से भी वास्तुकार बुलाए गए थे। जयपुर के निर्माण का कार्य 1729 ई. में पूर्ण हुआ।

महाराजा रामसिंह (Maharaja Ramsingh) | राजा रामसिंह (Raja Ramsingh) | GK Notes


महाराजा रामसिंह :
(Maharaja Ramsingh) :
(1667-1689 ई.) :

• शाहजहाँ के पुत्रों की लड़ाई में ये अपने पिता के साथ पहले दाराशिकोह के पक्ष में लड़े किन्तु बाद में औरंगजेब के पक्ष में हो गए।

• शिवाजी जब मुगल दरबार में 13 मई, आए इनकी 1666 को तब ही निगरानी में रखे गए अपने पिता के वचनों के अनुसार इन्होंने शिवाजी की पूर्णतया रक्षा की।

• रामसिंह के दरबार में कुलपति मिश्र ने ब्रजभाषा में रसरहस्य' की रचना की।

• इनके काल में अनेक ग्रन्थों की रचना की गई जिनमें मुहूर्त तत्व (लेखक-गणेश देवल) चगता पातशाही (लेखक - दलपतिराम, राजनीति निरूपणवैद्य बिनोद संहिता (लेखक-शंकर भट्ट) प्रमुख हैं।

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तीन मुगल बादशाहों (जहाॅंगीर, शाहजहाॅं व औरंगजेब) को अपने कार्यों से प्रभावित किया।

बिहारी मिर्जा राज जयसिंह का दरबारी कवि, इसने 1663 ई. में ‘बिहारी सतसई‘ की रचना की। जयसिंह ने बिहारी को 1-1 दोहे पर 1-1 स्वर्ण मुद्रा दी व गाॅंव भी ईनाम में दिये। इन्होनें जयसिंह को अय्यासी के चंगुल से छुड़ाया।

शाहजहाॅं ने अप्रेल 1639 ई. में इसको रावल पिण्डी बुलाकर ‘मिर्जा राजा‘ की पदवी दी। यह पदवी इनके दादा मानसिंह को भी अकबर ने दी थी।

शाहजहाॅं के मध्य एशियाई अभियान (1647 ई.) में जयसिंह ने अपने अपूर्व साहस का परिचय दिया।

जयसिंह प्रथम ने शिवाजी को बन्दी बनाने के लिये 23 जून 1665 ई. को पुरन्दर की सन्धि की। मिर्जा राजा जयसिंह के साथ 1665 ई. में पुरन्दर के घेरे के समय बर्नियर उपस्थित था।

जयसिंह द्वारा आमेर के महल, जयगढ और औरंगाबाद में जयसिंहपुरा नगर बसाया।

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आमेर के राजा भारमल का पौत्र, 6 दिसम्बर 1550 को इनका जन्म हुआ।भगवानदास की मृत्यु हो जाने के बाद 14 नवम्बर 1589 को आमेर की राजगद्धी पर बैठा।

मानसिंह अकबर का एक प्रसिद्ध मनसबदार एवं मुख्य सेनापति था।मानसिंह अकबर के नवरत्नों में से एक था। मानसिंह को अकबर ने फर्जन्द तथा राजा की उपाधि से सम्मानित किया।

मानसिंह के सम्पर्क में आने पर अकबर ने हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचार को बन्द करवा दिया।

मानसिंह ने अकबर के आग्रह पर दीन-ए-इलाही धर्म स्वीकार नहीं किया था।

21 जून 1576 ई. को हल्दीघाटी का युद्ध मुगलों की ओर से मानसिंह के नेतृत्व में लड़ा गया। मानसिंह के कारण ही अकबर को राणा प्रताप के विरूद्ध सफलता प्राप्त हुई।

मानसिंह के प्रमुख दरबारी कवि हाया बारहठ थे।

मानसिंह के प्रसिद्ध साहित्यकार पुण्डरीक विट्ठल ने रागमंजरी, रागचन्द्रोदय, नर्तन निर्णय, चूनी प्रकाश की रचना की।

मुरारीदास ने ‘मानप्रकाश‘ तथा जगन्नाथ ने ‘मानसिंह कीर्ति मुक्तावली‘ की रचना की। दलपत राज ने ‘पत्र प्रशस्ति‘ तथा तथा ‘पवन पश्चिम‘ की रचना की।

दादूदयाल ने मानसिंह के काल में वाणी की रचना की।

मानसिंह द्वारा बंगाल में अकबर नगर और मानपुर नामक दो नगरों की स्थापना की गई।

शिलादेवी, जगत शिरोमणी व गोविन्ददेव जी के मंदिरों का निर्माण आमेर में करवाया। 1586 ई. में मानसिंह बंगाल विजय के पश्चात् आमेर में शिलादेवी को लाया और अरावली की पहाड़ी पर इनका प्रसिद्ध मंदिर स्थापित किया।

इसके अतिरिक्त काशी में ‘मान मंदिर‘ व सरोवर घाट, वृन्दावन में 5 लाख की लागत का ‘गोविन्द मंदिर‘ पटना में ‘बैकुण्ठ मंदिर‘ रोहतासगढ में महल व अटक के पास ‘कटक बनारस‘ नामक किला वनवाया।

मानसिंह ने अकबर की मृत्यु के बाद जहाॅंगीर की जगह बादशाह बनाने में खुशरो का समर्थन किया था।

मानसिंह की मृत्यु 6 जुलाई 1614 में इलीचपुर (दक्षिण भारत) नामक स्थान पर हुई।

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भगवानदास (Bhagwandas) (1574 - 1589 ई.)


भगवानदास भारमल के ज्येष्ठ पुत्र थे। मानसिंह भगवानदास का दतक पुत्र था।

भगवानदास की पुत्री का नाम मानाबाई (सुलतान निस्सा था) जो 13 फरवरी 1585 को जहांगीर से लाहौर में विवाह होने के पश्चात् सुल्ताना मस्ताना के नाम से जानी गई।

अमीर खुशरो मानाबाई और जहांगीर का पुत्र था। अमीर खुशरो की हत्या मानाबाई द्वारा की गई और इतिहास में यह पहली पुत्रहन्ता माता के नाम से जानी गई। 6 मई 1604 को मानाबाई ने अफीम खाकर आत्महत्या कर ली।

अमीर-उल-उमरा भगवानदास को यह उपाधि अकबर द्वारा प्रदान की गई। ये कुछ समय के लिये लाहौर के गवर्नर भी रहे।

भारमल (Bharmal) | बिहारीमल (Biharimal) | Rajasthan History | Indian History | Rajasthan Gk | India Gk | Ssc | Ibps | Rpsc | Exam Notes | Banking Guru | Rajasthan Gk Hindi

भारमल (Bharmal) (1547-1573 ई.)

1562 ई. में मानसिंह केवल 12 वर्ष की अवस्था में अकबर का मनसबदार बना।

भारमल राजस्थान के प्रथम राजपूत शासक थे जिन्होने सबसे पहले अकबर (मुगलों) के साथ वैवाहिक संबंध कायम किये।

राजा, अमीर-उल-उमरा अकबर द्वारा भारमल को उपधियां प्रदान की गई।

सुलहकुल की नीति अकबर ने राजपूतों के साथ स्थापित की।

हरखाबाई इतिहास में बेगम मरियम उज्जमानी के नाम से प्रसिद्ध हुई। इनका विवाह 1562 ई. में अकबर के साथ उनकी अजमेर यात्रा के दौरान साॅंभर में हुई। जहाॅंगीर इन्हीं का पुत्र था।

जोधाबाई एक उपाधि का नाम है जो अकबर एवं जहाॅंगीर की पत्नियों में से मुख्य पत्नी को प्रदान की जाती थी।

यह उपाधि के. आसिफ द्वारा निर्देशित मुगल-ए-आजम के बाद में अधिक प्रचलित हुई है।

कछवाहा वंश (Kachwah dynasty) | Kachwaha Vansh | Kachvaha Vansh | India History | Rajasthan History | India Gk | Rajasthan Gk | Ssc | Ibps | Rpsc Notes | Exams Notes | Banking Guru

कछवाहा वंश (Kachwah dynasty)


कछवाहा वंश स्वयं को भगवान श्री राम के पुत्र कुश का वंशज मानते है।

967 ई. में दूल्हेराव द्वारा आमेर राज्य की स्थापना की गई। जयपुर के बसने से पूर्व जयपुर (ढूॅंढाड़) राज्य की राजधानी था। प्राचीन काल में यह अम्बावती तथा अंकिकापुर कहलाता था।

1727 ई. में जयपुर नगर बसने से पूर्व यह स्थल आमेर नाम से जाना जाता था।

कछवाहा राजवंश के संस्थापक दूल्हेराव (तेजकरण) थे। कछवाहा राजपूतों ने जयपुर रियासत पर शासन किया।

कछवाहा राजसंश सूर्यवंशी राजा रामचन्द्रजी के ज्येष्ठ पुत्र कुश के वंशज माने जाते है।

कछवाहों ने सबसे पहले दौसा में अपनी राजधानी स्थापित की थी।

1137 ई. में धोल्याराय द्वारा बड़गुर्जरों को परास्त कर ढूंढाड़ राज्य की स्थापना की गई।

हल्दी घाटी का युद्ध (Haldi Ghati Ka Yudth) | War of turmeric valley | Haldi Ghati | India Gk | India History | Rajasthan Gk | Rajasthan History | Gk | Ssc | Ibps | Rpsc Notes | Banking Guru | Exam Notes

हल्दी घाटी का युद्ध
(Haldi Ghati Ka Yudth)

हल्दीघाटी का युद्ध 21 जून 1576 को हुआ।

'मेवाड़ की थर्मोपोली' कर्नल जेम्स टाॅड ने हल्दी घाटी को कहा है।

यह युद्ध हल्दीघाटी के दर्रे से बाहर बनास नदी के निकट खमनौर गाॅंव (राजसमन्द) में हुआ।

महाराणा प्रताप, उनके मुस्लिक सेनापति हकीम खाॅं सूरी व मुगल सुबेदार मानसिंह और आसफ खाॅं के मध्य यह युद्ध हुआ।

इसमें महाराणा प्रताप की पराजय हुइ।



हल्दीघाटी अरावली पर्वतमाला में एक पहाड़ी दर्रा है।


दर्रे में हल्दी रंग की मिट्टी स्थित है।

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महाराणा प्रताप (Maharana Pratap)


महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को कटारगढ ‘कुम्भलगढ दुर्ग‘ में हुआ।

महाराणा प्रताप के पिता का नाम महाराणा उदयसिंह और माता का नाम जैवताबाई था।

इन्होनें अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिये मुगलों से आजीवन संघर्ष किया।

उदयपुर में स्थित गोगुन्दा स्थान पर 24 फरवरी 1572 को महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक हुआ।

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राणा साॅंगा (Rana Sanga)


महाराणा साॅंगा का जन्म 12 अप्रेल 1482 का हुआ।

राणा साॅंगा का पूरा नाम महाराणा संग्रामसिंह था।

इनका राज्याभिषेक 24 मई 1509 को हुआ।

ये संग्राम सिंह के नाम से प्रसिद्ध हुए।

ये महाराणा कुम्भा के पौत्र तथा महाराणा रायमल के पुत्र थे।

ये मेवाड़ के एकमात्र राणा थे जिन्होने राजपूतों को संगठित किया।

इनके बड़े भाई पृथ्वीराज और जयमल ईष्र्याग्रस्त होकर उन्हें मारना चाहते थे।

अजमेर के कर्मचन्द पॅंवार राज्याभिषेक से पूर्व तक राणा सांगा के आश्रयदाता रहे।

इनके पुत्र भोजराज मीरा के पति थे। मीरा को राजस्थान की राधा कहा जाता है। राजभोज का मीरा से 1511 ई. में विवाह हुआ और 1518 ई. में वह विधवा हो गई। मात्र 7 वर्ष तक वह अपना सधवा समय जी पाई और 1540 ई. में वृन्दावन में द्वारिकाधीश की मूर्ति में विलीन हो गई।





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महाराणा कुम्भा (Maharana Kumbha)


इनके पिता का नाम महाराणा मोकल था। महाराणा मोकल की हत्या के पश्चात राणा कुम्भा मेवाड़ के शासक बने।

महाराणा कुम्भा का काल ‘कला एवं वास्तुकला का स्वर्णयुग‘ कहा जाता है।

महाराणा कुम्भा जैन आचार्य ‘हीरानन्द‘ को अपना गुरू मानते थे।

महाराणा कुम्भा ने आचार्य सोमदेव को ‘कविराज‘ की उपाधि प्रदान की।

महाराणा कुम्भा की माता का नाम सौभाग्य देवी था।

रमाबाई महाराणा कुम्भा की पुत्री, संगीतशास्त्र की ज्ञाता थी। इनके लिये ‘वागीश्वरी‘ उपनाम का प्रयोग हुआ।

ईश्वर जावर रमाबाई द्वारा निर्मित विष्णु मंदिर की शिल्पी थी।

महाराणा कुम्भा संगीत की तीन विद्यायाओं ‘गीत-वाद्य-नृत्य‘ में पारदर्शी विद्वान थे।

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राणा मोकल (Rana Mokal)


इनके पिता का नाम महाराणा लाखा था।

ये मंडोवर के राव चूंडा के बड़े पुत्र थे।

इन्होने चितौड़ में एकलिंगजी मंदिर का निर्माण करवाया।

इनके काल में दिल्ली पर सैयद वंशीय शासक मुबारकशाह का शासन था।

राव चूड़ा लाखा का पुत्र, इन्हें भीष्म पितामह की उपाधि प्रदान की गई।

अपने पिता के लिये इन्होने हंसाबाई से विवाह करने से इनकार कर दिया एवं आजीवन ब्रहाचर्य की प्रतिज्ञा ली।




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महाराणा लाखा (Maharana Lakha)

इनका दूसरा नाम लक्षसिंह था।

सिसोदिया वंशीय यह एकमात्र शासक थे जिन्होने 62 वर्ष की आयु में मारवाड़ के रणमल राठौड़ की बहन हंसाबाई से विवाह किया।

राणा लाखा का वास्तविक उत्तराधिकारी 1421 ई. में राणा मोकल बना जो हंसा का ज्येष्ठ पुत्र था।

महाराणा लाखा ने ‘झोटिंग भट्ट‘ एवं ‘धनेश्वर भट्ट‘ जैसे विद्वान पण्डितों को राज्याश्रय दिया।

जावर लाखा के शासनकाल में जावर से चाॅंदी की खान निकली।

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चैहान वंश (Chouhan Vansh)
(Indian  History)




चौहान वंश (Chouhan Vansh) :-

शाकम्भरी के चौहान :-
                                वासुदेव चौहान ने 551 ई. में इस वंश की स्थापना की। वासुदेव चौहान ने साम्भर झील का निर्माण करवाया। इसका प्रमाण 1170 ई. में स्थापित बिजोलिया शिलालेख है।

                              चौहान वंश की अनेक शाखाऐं थी। इनमें सबसे प्रसिद्ध शाकम्भरी की शाखा थी। शाकम्भरी का समीकरण आधुनिक अजमेर के उत्तर में साम्भर नगर से लिया जाता है।

                             इस वंश के प्रारम्भिक शासक गुर्जर-प्रतिहारों के सामन्त के रूप में राज्य करते थे।

वाकपतिराज प्रथम :- 10 वीं शताब्दी के आरम्भ में वाकपतिराज प्रथम ने प्रतिहारों से अपने को स्वतंत्र कर लिया।

अजयराज :- 1113 ई. में अजमेर नगर की स्थापना की इन्होने तुर्की आक्रमणकारियों को पराजित किया।

विग्रहराज चतुर्थ :- चौहानों की शक्ति का सबसे अधिक विस्तार इसी के समय में हुआ। उसने दिल्ली और हाॅंसी पर कब्जा किया तथा तुर्की आक्रमणकारियों को परास्त किया।


प्रथ्वीराज तृतीय / रायपिथौरा :- पृथ्वीराज चौहान तृतीय अपने पिता सोमेश्वर की मृत्यु के बाद 11 वर्ष की अवस्था में शासक बना। चौहान वंश के अंतिम शासक एवं भारत के अंतिम हिन्दु सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने चालुक्यों एवं चन्देलों से युद्ध किया। पृथ्वीराज ने बुन्देलखण्ड के चन्देल शासक परमार्दिदेव को परास्त किया। इसी युद्ध में दो चन्देल वीर योद्धा आल्हा-उदल में से उदल मारा गया।

इनकी माता का नाम कर्पूरी देवी था।

चन्दबरदाई लोकसभा के प्रसिद्ध कवि, चौहान शासक पृथ्वीराज चौहान तृतीय के राजकवि एवं मित्र थे। इन्होनें पृथ्वीराज रासो ग्रन्थ की रचना की जिसे हिन्दी भाषा का प्रथम महाकाव्य कहा जा सकता है।


शेख हमीदुद्दीन नागौरी 1276 ई. में चिश्ती मत के प्रसिद्ध सन्त नागौर आकर बसे। एक किसान का सादा जीवन अपनाया।

रणथम्भार के चौहान :-
               इसकी स्थापना पृथ्वीराज चौहान तृतीय के पुत्र गोविन्दराज ने रणथम्भौर में 1194 ई. में चौहान वंश की नींव डाली। पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविन्दराज के लिये मोहम्मद गौरी ने अपने दास कुतुबुद्धीन ऐबक को उसकी सुरक्षा के लिये नियुक्त किया जो कालान्तर में दास वंश का पहला शासक बना।

हम्मीर देव :- रणथम्भौर के प्रतापी शासक हम्मीर देव के साथ अलाउद्दीन खिलजी ने 16 युद्ध किये।


जालौर के चौहान :- 
संस्थापक कीर्तिपाल या कीतू।
कान्हड़दे जालौर के शासकों में सबसे प्रतापी शासक।

हाड़ौती के चौहान :-
             राजस्थान का दक्षिणी-पूर्वी भाग को हाड़ौती अंचल कहा जाता है।

            1241 ई. में देवी सिंह ने बूॅंदा मीण को हराकर बूॅंदी और देवी सिंह के पुत्र समर सिंह ने कोटिया भील को हराकर कोटा राज्य की स्थापना की।

परमार वंश (Parmar dynasty) India General Knowledge || India Gk || Parmar Vansh Indian History || Parmar Vans India History || Indian History || Online Teyari

-: परमार वंश :-
-: (Parmar dynasty) :-

परमार वंश (Parmar dynasty) :-
मुंज :-
               इन्होनें 997 ई. में परमार के आहड़, चितौड़, इन्द्रावती ‘आबू‘ , किराड़ू ‘बाड़मेर‘ , अर्थूना ‘बाॅंसवाड़ा‘ पर अधिकार किया। ये विद्वानों के संरक्षक के रूप में जाने जाते है।

परमारों का मूल स्थान मालवा माना जाता है।

भोज ‘1000-1055 ई.‘:-

परमार वंश का योग्य और प्रतापी शासक।

उपनाम कविराज

            चिकित्सा, विज्ञान, खगोलशास्त्र, वास्तुशास्त्र आदि विषयों पर 20 से अधिक ग्रन्थों की रचना की।

        भोज द्वारा लिखित ग्रन्थ समरांगणसूत्रधार ‘शिल्पशास्त्र‘ , सरस्वती कण्ठाभरण , श्रंगार प्रकाश ‘अलंकार शास्त्र‘ , पतंजलीयोगसूत्रवृति ‘योगशास्त्र‘ , कूर्मशतक , चम्पूरामायण, श्रृंगारमंजरी ‘काव्य नाटक‘, आयुर्वेद सर्वस्व, तत्व प्रकाश ‘शैव ग्रन्थ‘, नाममालिका, शब्दानुशासन, सिद्धान्त संग्रह, राजा-मार्तण्ड, विद्या-विनोद, युक्ति-कल्पतरू, चारू चर्चा, आदित्य-प्रताप सिद्धान्त आदि।

भोज ने कवि भास्कर भट्ट को विद्यापति की उपाधि प्रदान की।

अरूंधति भोज की पत्नी, प्रसिद्ध विदुषी थी।

              संस्कृत साहित्य में भोज का नाम अमर है। भोज प्रत्येक कवि को प्रत्येक श्लोक के लिये एक लाख रूपये देता था। भोज के दरबार में भास्कर भट्ट, दामोदर मिश्र, उवत और धनपाल जैसे विद्वान थे।

          धारा भोज ने परमारों की राजधानी उज्जयिनी के स्थान पर धारा को राजधानी बनाया।

            धारा का लौह स्तम्भ भोज के शासनकाल में निर्मित।

         भोज ने धारा नगरी के चैराहों पर चैरासी मंदिर बनवाये जिनमें सबसे प्रमुख शारदा सदन था।

           विभुनारायण का मंदिर भोज ने चितौड़गढ में इस भव्य शिव मंदिर की स्थापना की।

       भोज ने केदारेश्वर, रामेश्वर तथा सोमनाथ के मंदिर का निर्माण करवाया।

         भोज ने बिहार में भोजपुर नगर एवं भोजसागर नामक तालाब का निर्माण करवाया।

           भोजपुर के निकट उसने 250 वर्ग मील के क्षेत्र में एक विशाल झील का निर्माण कराया।